लखनऊ विश्वविद्यालय में फीस वृद्धि के विरोध में चल रहा छात्र आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। धरने के 50 दिन पूरे होने के बावजूद छात्रों का आरोप है कि कुलपति प्रो. जे.पी. सैनी ने अब तक प्रदर्शनकारी छात्रों से एक बार भी मुलाकात नहीं की। इसी बीच दिल्ली में छात्रों के 23 दिन लंबे आंदोलन के बाद केंद्र सरकार द्वारा प्रतिनिधियों से बातचीत किए जाने की घटना ने एलयू के छात्रों को नई रणनीति अपनाने की प्रेरणा दी है।
छात्र नेताओं का कहना है कि जब शांतिपूर्ण धरना और लगातार संवाद की अपील के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने कोई पहल नहीं की, तो अब आंदोलन को राज्यव्यापी स्वरूप दिया जाएगा। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि बातचीत करने के बजाय प्रशासन ने कई छात्रों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए निष्कासन का रास्ता अपनाया, जिससे छात्रों में नाराजगी और बढ़ गई है।
धरने के दौरान कई राजनीतिक और सामाजिक हस्तियां भी छात्रों के समर्थन में पहुंचीं। सांसद पुष्पेंद्र सरोज, तनुज पुनिया, अवधेश प्रसाद, समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता माता प्रसाद पांडेय, अरविंद सिंह गोप, पूर्व छात्र संगठन और कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कुलपति से छात्रों के साथ संवाद स्थापित करने की अपील की। हालांकि छात्रों का दावा है कि अब तक उनकी मांगों पर कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई है।
अब आंदोलन को केवल लखनऊ विश्वविद्यालय तक सीमित न रखकर प्रदेशव्यापी अभियान बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय, गोरखपुर विश्वविद्यालय समेत अन्य शिक्षण संस्थानों के छात्र संगठनों से संपर्क किया जा रहा है। योजना है कि यूपी विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान सभी विश्वविद्यालयों के छात्र संयुक्त रूप से विधानसभा मार्च निकालेंगे, ताकि फीस वृद्धि और छात्र हितों से जुड़े मुद्दों को सरकार के सामने मजबूती से रखा जा सके।
यदि यह प्रस्तावित मार्च सफल होता है, तो यह विवाद केवल एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के उच्च शिक्षा संस्थानों का साझा मुद्दा बन सकता है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों से संवाद का रास्ता चुनेगा, या आंदोलन आने वाले दिनों में और व्यापक रूप लेगा।

