कभी-कभी इतिहास हमें आईना दिखाता है, लेकिन हम उसमें अपना चेहरा देखने के बजाय केवल दूसरों को खोजते रहते हैं। सोचिए… जिन स्थानों का निर्माण मनुष्य को भीतर से शांत करने, उसे अहंकार से दूर ले जाने और समाज में प्रेम, करुणा तथा नैतिकता का संदेश देने के लिए हुआ था, वे आज राजनीति की सबसे प्रभावशाली धुरी क्यों बन गए हैं? मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे या अन्य आस्था के केंद्र इनकी मूल भावना लोगों को जोड़ने की थी, लेकिन समय के साथ इन्हें चुनावी विमर्श का सबसे बड़ा हथियार बना दिया गया। राम मंदिर का मुद्दा वर्षों तक राजनीतिक बहस का केंद्र रहा और उसके बाद देश की राजनीति ने एक नया मोड़ लिया। अब जैसे-जैसे अगले चुनाव नजदीक आ रहे हैं, मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि फिर चर्चा में आने लगी है। सवाल किसी एक दल या विचारधारा का नहीं है, बल्कि यह है कि क्या लोकतंत्र में चुनाव जीतने का सबसे प्रभावी माध्यम अब केवल भावनाओं से जुड़े मुद्दे ही रह गए हैं?
अगर हम कुछ दशक पीछे लौटकर देखें तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। आजादी के बाद से लेकर हाल के वर्षों तक बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और रोजगार जैसे मुद्दों पर बड़े-बड़े जनआंदोलन हुए। जनता सड़कों पर उतरी, सरकारें बदलीं और सत्ता के समीकरण हिल गए। लेकिन आज ऐसा प्रतीत होता है कि वे मुद्दे कहीं शोर में दब गए हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि बेरोजगारी समाप्त हो गई, महंगाई खत्म हो गई या किसानों की समस्याएं नहीं रहीं। बल्कि सवाल यह है कि क्या हमने इन विषयों को राजनीतिक प्राथमिकता की सूची से नीचे सरका दिया है? या फिर समाज इतना विभाजित हो चुका है कि साझा नागरिक मुद्दों पर पहले जैसी व्यापक एकजुटता बन ही नहीं पा रही? लोकतंत्र की असली ताकत तब दिखाई देती है जब नागरिक अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े सवालों पर भी उतनी ही मजबूती से आवाज उठाएं, जितनी भावनात्मक विषयों पर उठाते हैं।
शायद आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई किसी मंदिर, मस्जिद या किसी एक नारे की नहीं होगी, बल्कि उस “नए मुद्दे” की होगी जो पूरे समाज को फिर से एक साझा दिशा दे सके। वह मुद्दा बेहतर शिक्षा भी हो सकता है, युवाओं के लिए रोजगार भी, किसानों की आय भी, न्याय व्यवस्था में सुधार भी, स्वच्छ राजनीति भी या फिर तकनीक और अवसरों से भरा नया भारत भी। लोकतंत्र में बदलाव केवल चुनावों से नहीं आता, बल्कि जनता की प्राथमिकताओं से आता है। जिस दिन नागरिक तय कर देंगे कि उनका सबसे बड़ा सवाल क्या है, उसी दिन राजनीति भी अपनी दिशा बदलने को मजबूर होगी। आखिर लोकतंत्र में सत्ता हमेशा वही मुद्दा उठाती है, जिसे जनता सबसे ऊंची आवाज में सुनाना चाहती है। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न किसी दल से नहीं, बल्कि हम सब से है—आने वाले भारत का सबसे बड़ा मुद्दा आखिर क्या होगा, और क्या हम उस पर एकजुट होकर खड़े हो पाएंगे?
अभिषेक आर्य की कलम से

